प्रकृति से विमुख होता मनुष्य: एक संस्कृति का अवसान

पिछले दिनों गाँव की पगडंडियों पर टहलते हुए एक पुराने परिचित बुजुर्ग से मुलाकात हुई। वे अपनी झुकी हुई कमर और धुंधली आँखों के साथ सूखे हुए पोखर की मेड़ पर बैठे शून्य को निहार रहे थे। जब मैंने उनसे बारिश और आने वाली फसल के बारे में पूछा, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी तैर गई। उन्होंने कहा, “बेटा, अब न तो हवाओं का मिजाज समझ आता है और न ही बादलों की भाषा। पहले मिट्टी की सोंधी खुशबू बता देती थी कि मेघ मल्हार गा रहे हैं, पर अब तो सावन में भी जेठ की तपन और पूस में सावन सी झड़ी लग जाती है।” उनकी बातों में केवल बढ़ते तापमान का दुख नहीं था, बल्कि उस सदियों पुराने भरोसे के टूटने की टीस थी, जो मनुष्य ने प्रकृति के साथ बनाया था।

लय खोता ऋतु चक्र और हमारी संवेदनाएं
आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहाँ ऋतुओं का कैलेंडर केवल तारीखों तक सीमित रह गया है। फागुन की वह मादकता अब तपती धूप की भेंट चढ़ चुकी है और वसंत की कोयल की कूक शहरी शोर के बीच कहीं खो गई है। जिसे आधुनिक विज्ञान ‘क्लाइमेट चेंज’ कहता है, वह असल में हमारी संवेदनाओं का बंजर होना है। भारतीय लोक जीवन में ऋतुएं केवल मौसम का बदलाव नहीं थीं, बल्कि वे हमारे जीने का ढंग थीं। कजरी, चैती और फगुआ जैसे लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं थे, वे प्रकृति के प्रति हमारे आभार व्यक्त करने के अनुष्ठान थे। जब ऋतुएं ही अपने समय से निर्वासित हो गई हैं, तो उन पर आधारित हमारी सांस्कृतिक स्मृतियां भी धुंधली पड़ने लगी हैं।

क्लाइमेट एंग्जायटी: रसोई से मस्तिष्क तक
जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक सम्मेलनों का विषय नहीं रहा, यह हमारी रसोई की थाली, हमारे त्योहारों के उल्लास और हमारे मानसिक स्वास्थ्य के भीतर तक पैठ बना चुका है। इसे आज की शब्दावली में ‘क्लाइमेट एंग्जायटी’ (पर्यावरण संबंधी चिंता) कहा जा रहा है। आने वाली पीढ़ियों के लिए भविष्य की अनिश्चितता एक डरावने सपने जैसी है। क्या उन्हें कभी वह स्वच्छ नदियाँ मिलेंगी जिनके घाटों पर हमारी सभ्यताएं पली-बढ़ीं? क्या वे कभी उस शीतल बयार का अनुभव कर पाएंगे जो बिना किसी कृत्रिम उपकरण के मन को शांत कर देती थी?

विरासत का क्षरण और पहचान का संकट
हमारे पुरखों ने नदियों को माँ और पेड़ों को देवता माना था। यह अंधविश्वास नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी तरीका था। आज जब हम एक-एक कर अपने जलस्रोतों को सूखते देख रहे हैं, तो हमें समझना होगा कि यह केवल पानी की कमी नहीं है; यह उस पूरी संस्कृति का अंत है जो इन घाटों पर पल्लवित हुई थी। नदियों का सूखना हमारी पहचान के एक बड़े हिस्से का मर जाना है। जब प्रकृति से हमारा रिश्ता केवल ‘उपभोग’ का रह जाता है, तब श्रद्धा और आदर का भाव समाप्त हो जाता है।

कागजी विमर्श से आगे की राह
पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई अब केवल सेमिनारों और कागजी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रह सकती। हमें अपनी जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने यह मान लिया कि हम प्रकृति को जीत सकते हैं, जबकि सत्य यह है कि हम प्रकृति का एक सूक्ष्म हिस्सा मात्र हैं। यदि हमने प्रकृति के प्रति अपने पारंपरिक दृष्टिकोण को फिर से नहीं जगाया, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें केवल उस समाज के रूप में याद रखेंगी जिसने अपनी ही जड़ों को काट दिया था।

बादलों की बोली को फिर से समझने के लिए हमें फिर से उसी मिट्टी से जुड़ना होगा। हमें अपनी नदियों के प्रति वही आत्मीयता जगानी होगी जो हमारे पूर्वजों में थी। प्रकृति के साथ संवाद की भाषा शब्द नहीं, बल्कि संवेदना और संरक्षण है। यदि हम आज भी सचेत नहीं हुए, तो वह दिन दूर नहीं जब वसंत केवल किताबों के पन्नों और गीतों की पंक्तियों में ही जीवित बचेगा, और बाहर की तपिश हमारे अस्तित्व को झुलसा देगी। समय है कि हम बादलों की उस भूली हुई बोली को फिर से सीखने का प्रयास करें और प्रकृति के साथ अपना खोया हुआ रिश्ता पुनर्जीवित करें।

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